उलटबांसी


प्रधानमंत्रीजी! पिछले दिनों आपके मंत्रीमंडल के आठ-दस मंत्रियों पर ईमानदार और आदर्शवादी होने के आरोप लगे हैं। इस पर आप क्या कहना चाहेंगे?


मैं नहीं मानता कि जिन लोगों पर ऐसे आरोप लगे हैं वे सचमुच ईमानदार हैं। ये मंत्रीगण चाहे मेरी पार्टी के हों या घटक दलों के, सरकार की नीतियों और परम्पराओं से कतई अलग नहीं हैं। किसी ने कभी भी घोटालों से परहेज़ नहीं किया। हां, ये हो सकता है कि इनमें से कुछेक विपक्षियों के बहकावे में आकर ऐसा आचरण कर बैठे हों। सरकार की छवि को बिगाड़ने की ऐसी कोशिशें विपक्ष की ओर से पहले भी हुई हैं।


क्या ये सच नहीं कि आकाश मंत्री ने वायुमंडल के आबंटन में तो कोई कमीशन लिया ही किसी अपने को फ़ायदा पहुंचाया।


ये आंशिक सच है। इस मामले में इंकार एक स्ट्रैटज़ी के तहत किया गया, जबकि कमीशन वग़ैरह क़ायदे से ही लिये-दिये गये हैं।


कहा ये भी जा रहा है कि गोवा के समुद्र-तल में बने आवासीय फ़्लैटों में एक भी किसी नेता या अफ़सर के नाम एलॉट नहीं है। क्या ये ईमानदारी का स्पष्ट प्रमाण नहीं है?


अव्वल तो ये सम्भव नहीं है कि कोई ऐसा शानदार प्रोज़ेक्ट सामने हो और उसमें हमारे नेता अफ़सरों की रुचि हो, पर फिर भी अगर ये सच हुआ तो सरकार ज़रूरी कदम उठा कर कम से कम आधे आबंटन अब भी अपने लोगों के नाम करवाएगी। हमारी पार्टी किसी भी क़ीमत पर अपनी छवि को आंच नहीं आने देगी।


पिछले साल भर में देश में ज़रूरी चीज़ों की क़ीमतें या तो स्थिर रही हैं या फिर नीचे गिरी हैं। सब ओर हो-हल्ला मचा हुआ है कि आखिर ऐसी कुव्यवस्था फैली कैसे। आम जनता आकस्मिक बचत होने और अचानक आई खुशहाली से बुरी तरह बौखलाई हुई है। सरकार पर क़ीमतों पर नियंत्रण लगाने के आरोप लगाये जा रहे हैं। आपकी प्रतिक्रिया?


ये सच है कि चीज़ों, ख़ासकर खाने-पीने की चीज़ों की क़ीमतों में अपेक्षित वृद्धि नहीं हुई। क़ीमतों को ऊपर उठाने के सभी संभव कदम उठाये गये हैं। हमने इस बीच आठ-दस बार डीज़ल और रसोई गैस की क़ीमत बढ़ाई और ख़ुदरा बिक्री पर दाम बढ़ाने की खुली छूट दी. यही नहीं, जमाखोरी और कालाबाज़ारी को सभी क्षेत्रों में भरपूर प्रोत्साहन दिया गया। फिर भी अगर अपेक्षित परिणाम नहीं रहे तो हो सकता है कि ये जमाख़ोरों की क़ोताही है या फिर उद्योगपतियों द्वारा मुनाफ़ाखोरी में लापरवाही का नतीज़ा। कोई बात नहीं! हम इन सब पर पार्टी फ़ंड के चंदे की नई किस्त ठोक कर चुस्त बना देंगे। मुझे यक़ीन है अगले महीने तक आप मुद्रा-स्फ़ीति की दर को बीस के अंक के उस पार देखेंगे।


कहा जा रहा है कि सतर्कता आयोग के नये अध्यक्ष ने अपने पूरे कैरियर में एक भी घोटाला संपन्न नहीं किया। ऐसा व्यक्ति आख़िर किस अर्हता के आधार पर चुना गया? सदियों से परम्परा चली रही है कि देश में सबसे अधिक घोटाले करने वाले अधिकारी को ही इसका पात्र समझा जाता है।


मैं इससे असहमत हूं! श्री भद्रलोक की छवि पूरी तरह दागदार है। वे केवल एक मामले में गलती से आरोप मुक्त हुये थे जिसे मीडिया ने मुद्दा बना लिया है। जिस घोटाले का ये मामला है उसमें भी वे पूरी तरह संलिप्त थे, पर एक साज़िश के तहत डील के कमीशन को किसी और के ख़ाते में ट्रांस्फ़र कर उनकी छवि पर ईमानदारी का धब्बा लगाने का प्रयास हुआ।


आपकी सरकार पर एक गंभीर आरोप ये है कि आपके कार्यकाल में नेता-अफ़सर-उद्योगपति के बीच का नेक्सस कमज़ोर हुआ है, जिससे समानान्तर अर्थव्यवस्था को धक्का लगा है। इस समृद्ध अर्थव्यवस्था को पिछली सदी से लगातार कई सरकारों ने अथक प्रयासों के जरिये चरमोत्कर्ष पर पहुंचाया है। अगर ये नेक्सस टूट गया तो प्रजातांत्रिक मूल्यों को कैसे बचाया जा सकेगा।


मीडिया में फैले इस भ्रम का क्या स्त्रोत है मुझे नहीं मालूम, पर इतना आश्वासन मैं दे सकता हूं कि ऐसा कुछ भी नहीं हुआ है। उलटे इस दौर में हमारी नीतियों के फलस्वरूप बचे-खुचे अफ़सर और उद्योगपति भी इस ज़रूरी नेक्सस में शामिल हुये हैं। हमारा नारा सदा से रहा है- लूटो-खाओ, देश बढ़ाओ। प्रजातंत्र को कहीं कोई ख़तरा नहीं है। आरोप तो ये भी लगे हैं कि फ़ोन-टैपिंग में ढील दी जा रही है। मैं ये बताना चाहूंगा कि सब कुछ बदस्तूर ज़ारी है और सारे रिकार्ड सरकार के पास हैं जो सिद्ध कर देंगे कि जिस नेक्सस की बात हो रही है वो केवल मज़बूत हुआ है बल्कि उसके आयाम और फैल गये हैं। अपराधियों को इसमें और मज़बूती से जोड़ा गया है और कलाकारों, साहित्यकारों, क्रिकेटरों जैसे तबक़ों को भी शिरक़त देने का काम जारी है। दरअसल इस नेक्सस को केवल तीन आयामों तक सीमित मानना मीडिया की पिछड़ी समझ का नमूना है।


सरकार पर लगे आरोपों के लिये आप साझा सरकार की मज़बूरियों को कहां तक ज़िम्मेदार मानते हैं?


साझा सरकार भ्रष्ट छवि के विस्तार में सदा सहायक होती है क्योंकि इससे केन्द्र में क्षेत्रीय भ्रष्टाचार के नये नये आयाम जुड़ते हैं। सभी एक दूसरे से प्रेरणा लेकर अपने अनुभवों और उप्लब्धियों में ईज़ाफ़ा करते हैं। इसीलिये हमने चुनाव के बाद कोई मज़बूरी होते हुये भी सरकार साझे में ही बनाया। पर इस गठबंधन में कुछ ऐसे घटक-दलों ने भी घुसपैठ कर ली जो दिखावे के लिये तो भ्रष्ट बने रहे पर संभवतः उन पर कुछ ईमानदार और आदर्शवादी नेता हावी होने लगे हैं। ईमानदारी के आरोपी मंत्री भी ऐसे ही एक घटक दल के हैं। इस घटक दल के नेता को चेतावनी दे दी गई है कि वे अपने रवैये में सुधार लायें और आईंदा ऐसी छवि वाले नेता को मंत्री पद के लिये प्रस्तावित करने से गुरेज़ करें। ऐसे एकाध मामलों के आधार पर सरकार की छवि निर्धारित नहीं की जा सकती। सारे सरकारी काम परम्परानुसार भ्रष्ट तरीके से ही सम्पन्न किये जा रहे हैं, ये मैं दावे के साथ कह सकता हूं।


कुछ विदेश नीति की चर्चा करें। वाम-दलों का आप पर आरोप है कि आपकी सरकार चीन की ग़ुलाम हो गई है और उसके प्रभाव में प्रगतिशील अमरीका से नीतिगत विरोध रखने लगी है। उधर आपके सबसे निकट साझीदार दक्षिण-पंथी पाक़िस्तान से ख़राब रिश्तों के लिये आपको ज़िम्मेदार ठहरा रहे हैं। आप क्या कहेंगे?


सभी जानते हैं कि हमारी विदेश नीति इस सूत्र पर टिकी है कि विश्व तो क्या दक्षिण एशिया भी हमारा कुटुंब नहीं है। हमारा कुटुंब वही है जो चाहे राजनीतिक बैर रखे पर हमारी समानान्तर अर्थनीति को बल देता रहे। इस लिहाज़ से चीन हमारे नज़दीक है सो उससे हर क़िस्म का तालमेल चल रहा है। दुनिया में हर देश की व्यवस्था हम-जैसी नहीं है। जब सब जगह हमारे-सा ही प्रजातंत्र हो जायेगा तो वसुधैव कुटुम्बकम वैसे ही हो जायेगा। रहा पाक़िस्तान तो उससे रोज़-रोज़ की झड़पों के जरिये सम्बन्ध सुधारने का प्रयास ज़ारी है। दरअसल हमारे दक्षिणपंथी दोस्त चाहते हैं कि इन दिनों पाक़िस्तान द्वारा आतंकवाद को जड़ से मिटाने के लिये उठाये जा रहे कदमों का हम सख्ती से विरोध करें और उससे कहें कि वह सरहद पार से आतंकियों की खुलेआम आवाजाही होने दे। चाहते तो हम भी हैं पर इन दिनों पाक़िस्तान तालिबान के साथ मिल कर कश्मीर सहित पूरे इलाक़े में अमन फैलाने में लगा है। इससे ऐसा भ्रम फैलना स्वाभाविक ही है।


कहा जाता रहा है कि आप अर्थशात्रियों के एक दल का राजनीतिक चेहरा भर हैं। आप एक प्रख्यात अर्थशास्त्री रहे हैं और आर्थिक प्रजातंत्र के प्रणेता हैं जो देश की हर व्यवस्था का आधार है। देश के सारे फैसले अर्थशास्त्रियों की बैठक में ही लिये जाते हैं और आप महज़ उनकी आर्थिक नीतियों को राजनीतिक तरीके से लागू करने का औज़ार भर हैं। जब देश ही नहीं पूरी दुनिया केवल आर्थिक लेन-देन के आधार पर चलती है तो एक राजनीतिक पीएम के रूप में आपकी क्या उपयोगिता है?”


सभी जानते हैं कि सरकार चलाने में सत्ता पक्ष के सहयोगी दलों का विरोध निरंतर झेलना ही पड़ता है। ऐसे में विरोधी दलों का ही सहारा है क्योंकि वही हैं जो हमेशा चाहते हैं कि हमारी सरकार कायम रहे। इसीलिये संसद में पिछले शक्ति परीक्षण के दौरान मैंने कई समर्थक दलों को समुचित धन-राशि देकर उन्हें विरोधी ख़ेमें में पहुंचाया। एक साफ़-सुथरी छवि का राजनैतिक नेता ही ये कारनामा कर सकता है। मीडिया ने तो यहां भी ये मिथ्या आरोप लगाया कि सरकार को बचाने में कुछ भी नहीं लिया-दिया गया। आप मीडिया वालों की भी कोई ज़िम्मेदारी है कि नहीं। मैं तो सरकार पर लगे ईमानदारी, सच्चरित्रता, खुशहाली या घनघोर आर्थिक प्रगति जैसे हर आरोप की ज़िम्मेदारी खुद ही लेता हूं, कभी किसी और पर नहीं थोपता। पीएम के रूप में यही है मेरी उपयोगिता

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