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Showing posts from October, 2015

दाल और घर की मुर्गी

आज मुर्गी और दाल के बदले समीकरण पर थोडा चिंतन किया. “घर की मुर्गी दाल बराबर” वाले मुहावरे के जन्म-काल के समय इन दोनों वस्तुओं को बराबर कर देने वाला कौन सा तराज़ू इस्तेमाल किया गया था इस पर हिंदी भाषा का अर्थशास्त्र कुछ नहीं कहता। मुर्गी ही क्यों तोली गई, उसके शौहर मुर्गे को शोरबे में तब्दील करने का चलन तब तक नहीं था क्या? इन दोनों के मिले-जुले प्रयासों से बनने वाले गोल-गोल अंडे इस तुलनात्मक अध्ययन के दायरे में क्यों नहीं आये- ऐसे ही कुछ गंभीर और मौलिक सवाल मेरे जेहन में उभरे। ये तो तय है कि मुर्गी तब घर पर ही रहती थी और दाल के दाने भी रसोई के डिब्बे में ही पाए जाते थे. मुर्गी ज़रूर मौक़ा पाकर इन दाल के दानों को चुगती होगी, जिससे उसमें दाल का स्वाद आ जाता होगा. मुहावरेे में कहीं इसी वजह से उसे दाल बराबर न बता दिया गया हो। तब से हालात में काफी अन्तर आया है. न मुर्गी घर पर रहती है न ही दाल रसोई के डिब्बे में. पहली बाज़ार से छील-तराश के तैयार आती है तो दूसरी अक्सर बाज़ार में छुपी बैठी होती है और ऊंची कीमत देने पर ही घूँघट हटाती है. उधर मुर्गी को भी गायब हो जाने का रोग है. ये रोग छठे-छमासे उ...