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Showing posts from September, 2012

कॉर्पोरेट अभिमन्यु- आज के कॉर्पोरेट दौर के अभिमन्यु कैसे व्यूहों में घुसते और कैसे उन पर विजय पाते हैं, इसकी एक कल्पना की थी... "व्यंग्य-यात्रा" पत्रिका में प्रकाशित ये व्यंग्य ब्लॉग पाठकों के लिए...

कॉर्पोरेट अभिमन्यु अट्ठाईस साल पहले एक परम महत्वाकांक्षी पति-पत्नी के आपसी संयोग से उसके इस पृथ्वी पर आने की सम्भावना बनी. अर्जुन सिंह उन दिनों एक प्राइवेट कंपनी में अपने भविष्य को उज्जवल बनाने हेतु तपस्या-रत थे. वे सभी प्रकार के क्वालीफिकेशंस से युक्त कुछ नई विधाओं में पारंगत होने हेतु दिन-प्रतिदिन कोई नया कोर्स ज्वाइन कर लेते. क्रमशः पदोन्नतियां पाते और इस क्रम में कई व्यूहों को भेदते उन्होंने अपना लक्ष्य अर्थात कंपनी का वाइस प्रेसिडेंट का पद प्राप्त कर लिया. कालान्तर में उन्होंने इस कंपनी को अंगूठा प्रदर्शित कर अपनी ‘ इन्द्रप्रस्थ प्राइवेट लिमिटेड ’ कंपनी स्थापित कर ली. अपने इस दिव्य कैरियर के विविध चरणों को सात व्यूहों के मॉडल में ढाल कर उन्होंने उसे ‘ चक्रव्यूह ’ की संज्ञा दी और इसे भेदने की विधियों को अपने नाम से पेटेंट करा लिया. यही पराक्रमी पुरुष एक रात्रि अपनी गर्भवती पत्नी से समक्ष इस मॉडल का वर्णन कर रहा था जब परम्परानुसार ही ऊब से जम्हाईयाँ लेती उनकी पत्नी सुभद्रा निद्रा की गोद में समा गईं और ये जानने से वंचित रह गईं कि व्यूह के भीतर से सारा ज्ञान और अनुभव बटो...