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आज तीन साल के बाद दुबारा ब्लॉग करते हुए ये सोच रहा हूँ कि क्या हुआ था इस बीच जो चुप्पी लग गई। किसी ने याद दिलाया तो मुझे याद आया। हालांकि इधर खूब लिखा, एक किताब भी आ गई, पर वही कि चिट्ठियों सा कुछ लिखने का अभ्यास छूट गया। हम सब शब्दों के संकुचन के दौर में जी रहे हैं। सोच तक विस्तार नहीं ले पाती। जल्दबाजी में हैं हम। बहुत पढ़ते हैं पर कुछ भी जज़्ब नहीं कर पाते। खूब घूमते हैं पर कहीं जुड़ते नहीं। नए हालातों ने हमें बंधक बना रखा है। इन जंजीरों से छूटने की ज़रूरत है।
एक नया जुनून पाला। भूली-बिसरी कुछ पुरानी फ़िल्में डाउनलोड की और एक सिरे से देखना शुरू किया। फिल्मों के अलावा भी कई दृश्य आँखों के सामने आये। हर फिल्म से एक अलग समय का जुड़ाव था। पुरानी चिठ्ठियाँ निकाल के पढ़ने का-सा सुख। आज के दौर के कुछ सफे भी खुलते महसूस हुए। अफसोस इस अभियान में कोइ साथी नहीं था। किसी के साथ ये कर देखने का जी हो आया।
दिनचर्या आवाज़ लगा रही है। दो घड़ी के अपने आप के इस साथ को टालना होगा। फिर कभी लौटता हूँ।

Comments

anupama pathak said…
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सिर्फ इतना ही कहेंगे... रोती हुई आखें खिलखिला उठीं...:) नम आखों का हँसना कितना संतोषपूर्ण होता हैं न मामाजी...! इस पोस्ट के लिए आपका कोटि कोटि आभार.....
पापा जी ने सिंदरी में हमें आपकी किताब दी थी... हमने वह किताब पढ़ी थी... आज यहाँ आपको पढ़कर सामने बैठकर बात करने जैसा अनुभव हो रहा है...! बहुत दुखी थे यूँ ही... अब बहुत खुश हैं:) ' आओ जियें खुलके ' ने बात करना जो शुरू कर दिया...
आपके ब्लॉग का लिंक चेहरा-ए-किताब (Facebook) से मिला... बस हम तो लपक लिए कुछ कहकहे और कुछ अनकहे बातों के रसास्वादन के लिए... आप लिखते रहिये और कहते रहिये... खुल कर जीने के लिए हम आते रहेंगे... :-)

सादर
शशि

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